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रेबारी की उत्पत्ति और इतिहास

रेबारी, राईका, देवासी, देसाई या गोपालक के नामसे जानी जाती यह ज्ञाति राजपूत जातिमे से उतर आई है! ऐसा कई विद्वानोनो का मानना है!
रेबारी को भारतमें रायका, देसाई, देवासी, धनगर, पाल, हीरावंशी, कुरुकुरबा, कुरमा, कुरबरु, गडरिया, गाडरी, गडेरी, गद्दी, बधेल के नाम से भी जाने जाते है!
यह जाति भली भोली और श्रध्धाळु होनेसे देवो का वास उसमे रहता है या देवके वंशज होने से उसे देवासी के नामसे भी जानी जाती है! रेबारी शब्द मूल 'रवड' शब्दमेसे उतर आया है! रेवड याने 'ढोर या पशु' या गडर का टौला! और पशुओका टोला को रखता है या संभालत है उसे 'रेवाडी' के नाम से पहचाना जाता, और बादमे अपभ्रंश हो जाने से यह शब्द 'रेबारी' हो गया!
रेबारी पूरे भारतमां फैले हुए है! विशेष करके उत्तर, पश्विम और मध्य भारतमे! वैसे तो पाकिस्तानमे भी अंदाजित 8,000 रेबारी है! रेबारी जातिका इतिहास बहुत पूराना है! लेकीन शुरू से ही पशुपालन का मुख्य व्यवसाय और घुमंतू (भ्रमणीय) जीवन होनेसे कोई आधारभुत ऐतिहासिक ग्रंथ लीखा नही गया और अभी जो भी इतिहास मील रहा है वो दंतकथाओ पर आधारीत है! मानव बस्तीसे हंमेशा दूर रहने से रेबारी समाज समय के साथ परिवर्तन नही ला सका है! अभी भी ईस समाजमे रितरीवाज, पोशाक, खोराक ज्यो का त्यो रहा है! 21वीं सदीमे शिक्षित समाजके संम्पर्कमे आनेसे शिक्षण लेनेसे सरकारी नौकरी, ब्यापार उद्योग, खेती बगैरह जरूर अपनाया है!
हर ज्ञाति की उत्पत्ति के बारे में अलग अलग राय होती है वैसे ही इस जाति के बारे मे भी कई मान्यताए है!
इस जाति के बारे मे पौराणिक बात यह कहि जाती है कि भगवान शिवजी ने अपनी ऊट (Camel) की देखभाल के लीए एक आदमी का सर्जन कीया वोही पहला रेबारी था! उनकी चार बेटी हुई, शिवजी ने उनके ब्याह राजपूत (क्षत्रीय) जाति के पुरुषो के साथ कीये! और उनकी संतती हुई वो हिमालय के नियम के बहार हुई थी इस लीये वो “राहबरी” या “रेबारी” के नामसे जानी जाने लगी!
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