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रेबारी की उत्पत्ति और इतिहास

 

Rabari man

 

एक मान्यता के अनुसार, मक्का-मदीनाके इलाकोमे महम्मद पयंगबर साहब से पहले जो अराजकता फैली थी जिनके कारणे मूर्ति पूजा का विरोध होने लगा! उसके परिणामसे यह जाति ने अपना धर्म बचाना मुश्किल होने लगा! तब अपने देवी-देवताओको पालखीमे लेके हिमालयके रास्ते से भारतमे प्रवेश कीया होगा. (अभी भी कई रेबारी अपने देवी-देवताको मूर्तिरूप प्रस्थापित नही करते, पालखीमे ही रखते है!) उसमे हूण और शक का टौला सामेल था! रेबारी ज्ञातिमे आजभी हूण अटक(Surname)है! इससे यह अनुमान लगाया जाता है की हुण इस रेबारी जाति मे मील गये होंगे!

 

एक ऐसा मत भी है की भगवान परशुरामने पृथ्वीको 21 बार क्षत्रीयविहीन की तब 133 क्षत्रीयोने परशुराम के डरसे क्ष्रात्रधर्म छोडकर पशुपालनका काम स्वीकार लिया! ईस लीये वो 'विहोतर' के नाम से जाने जाने लगे! विहोतेर मतलब 20+100+13=133.

 

भाट,चारण और वहीवंचाओके ग्रंथो के आधार पर, मूल पुरुषको 16 लडकीयां हुई और वो 16 लडकीयां का ब्याह 16 क्षत्रीय कुल के पुरुषो साथ कीया गया! जो हिमालयके नियम बहार थे, सोलाह की जो वंसज हुए वो राहबारी और बादमे राहबारीका अपभ्रंश होनेसे रेबारीके नामसे पहचानने लगे! बाद मे सोलाहकी जो संतति हुई वो एकसो तेत्रीस शाखामे बीखर गई, जो "विशा तेर" (विशोतेर) नात याने एकसो बिस और तेरह से जानी गई!

 

प्रथम यह जाति रेबारी से पहचानी गई, लेकीन वो राजपुत्र या राजपूत होनेसे रायपुत्रके नामसे और रायपुत्रका अपभ्रंश होनेसे 'रायका' के नामसे , गायोका पालन करने से 'गोपालक' के नाम से, महाभारतके समयमे पांडवोका महत्वपूर्ण काम करने से 'देसाई' के नामसे भी यह जाति पहचानी जाने लगी!

 

पौराणिक बातो मे जोभी हो, किंतु ईस जातिका मूल वतन एशिया मायनोर होगा की जहासे आर्यो भारत भूमि मे आये थे! आर्यो का मुख्य व्यवसाय पशुपालन था ओर रेबारी का मुख्य व्यवसाय आजभी पशुपालन हि है! इसी लीये यह अनुमान लगाया जाता है की आर्यो के साथ यह जाती भारतमें आयी होंगी!

 

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